कुछ तो किये हैं पाप, ……… जो मिला है ये अभिशाप

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वो गिरना – सम्भलना,

उठ के आशा भरी नजरों से माँ को निहारना

मेरे हर नए कदम पे माँ का मुस्कुराना

और फिर अपनी आँखें खुशी से नम कर लेना…

वो मेरा पहला कदम, वो मेरी पहली बोल, वो पहला दिन स्कूल का,

मेरे लिए कुछ भी नहीं,

और उनके लिए उद्देश्य जीवन भर का I

हाउस वाइफ लोग कहते हैं उन्हें,

लेकिन मेरे जीवन में उनकी भूमिका एक कुशल मूर्तिकार का I

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17 साल का था, जब मैं भी

बाकी के छोटे शहर के बच्चों की तरह

बड़े शहर की ओर पलायन किया

पढ़ाई पूरी की, नौकरी मिली और व्यस्त हो गया I

एक दशक में मैं

मूर्ति बन के तैयार हो गया I

जीवन में जो पाया

उससे खुश हैं मेरी माँ

और शायद ……..मैं भीI

लेकिन फिर सोचता हूँ की मैंने क्या पाया

जो अपनी माँ से ही मिल नहीं पा रहाI

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वो आज भी मूर्तिकार हैं

दूर गांव में अब अपने बड़े बेटे के बच्चों को

मूर्ति का रूप दे रही हैं

और मेरे लिए वधू

ढूंढ रही हैंI

पापा के बढ़ते उम्र ने

उन्हें कमजोर बना दिया है

जो कल तक

अपने परिजनों की शादी में बढ़ चढ़ कर

हिस्सा लेते थे

आज उनकी बढ़ती उम्र और गिरते स्वास्थ ने उन्हें डरा दिया हैI

डरते हैं की कही अपने बेटे की शादी भी देख पाएंगे या नहीं

दस साल बीत गए दिल्ली में,

अब बड़ा हो गया हूँ मैं

लोग कहते हैं

मैच्योरिटी आ गयी है,

लेकिन क्या करु मैं इस मैच्योरिटी काI

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आज मेरे नए कदम पे खुशी के आँसू नहीं बहते

बड़े शहर में रहने वाले दोस्त

अपने आंगन में हैं,

अपने मूर्तिकार के साथ

फिर छोटे शहर के बच्चे क्यों नहीं?

कुछ तो किये हैं पाप

जो मिला हैं ये अभिशाप

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क्यों नहीं मुझे सुबह मेरी माँ जगा सकती हैं

क्यों नहीं छोटे से जुकाम होने पे

वो मुझे ऑफिस जाने से रोक सकती हैं

क्यों नहीं मेरे ऑफिस पहुचने खाना खाने, ऑफिस से निकलने की

रिपोर्टिंग ले सकती हैं

क्यों नहीं मेरी माँ मुझे जल्दी सोने के लिए डांट सकती हैं

क्यों नहीं लेट नाईट वीकेंड पार्टी के कारण मेरा खाना

बंद कर सकती हैं …..

कुछ तो किये हैं पाप

जो मिला है ये अभिशाप

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आती हैं कभी कभी … इस बड़े शहर में…. कुछ दिनों के लिए

और फिर चली जाती हैं …….महीनों के लिए

साल में 10 दिन के लिए मैं जाता हूँ….. गांव

और 10 दिन के लिए वो आ जाती हैं ……इस बड़े शहर में

ये 20 दिन ही हैं शायद ……मेरे हिस्से में

हाँ फोन पे उनके आधे घंटे रोज जरूर चुरा लेता हूँ मैंi

गांव जाता हूँ तो माँ कहती है पहले भगवान को प्रणाम करो

मैं जबरन पहले उनके पैर छूता हूँ,

ये सोचकर की जिस भगवान को देखा है

पहले उनके पैर छू लू

मन छोटा हो जाता है, आँखें भर आती है अकेले में

जब लोग कहते हैं की लोगों औसतन आयु 60-70 साल रह गयी हैं

मेरी मूर्तिकार तो 65 साल की हैं

क्या ये 20 दिन की कड़ी भी …….. टूटने वाली है

क्या ये फोन का सिलसिला भी …….. छूटने वाला है

क्या घर जाने पर मुझे सीधा भगवान के फोटो के पास ही पहुँचना होगा माँ

लोग कहते है पिछले जन्म के पाप का भी

इसी जन्म में हिसाब देना होता है

क्या ये वही हैं

वरना बड़े शहर के दोस्तों की तरह मैं भी

आपकी गोद में बैठ मूर्ति बनता…..

और शायद होली – दिवाली आपके साथ मनाता

मैं जनता हूँ आप नहीं मानोगी माँ, लेकिन आपके बेटे ने भी

कुछ तो किये हैं पाप

जो मिला है ये अभिशाप

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धन्यवाद

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